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October 29, 2014

मेरे कमरे की वो खिड़की बड़ी सयानी थी

मेरे कमरे की वो खिड़की बड़ी सयानी थी

उसने देखा मेरा बचपन मेरी जवानी थी

यही है वो जिसने था जगाया मुझे हर सुबह
सूरज की किरणों के साथ मिलके ये देती थी मुझको गुदगुदा
पर्दों से इसको अपना गुस्सा दिखाया मैने
अपने नींद को थोड़ा सा और बड़ाया मैने
पर हमारी दोस्‍ती काफी पक्की थी
की हवा पर्दों पे जैसे ही लपक थी
मैं अपने हाथ को फिर खिड़की की तरफ बडता था
पर्दा उसके और खुद के बीच से हटाता था
हवा का झोंका जैसे उसे मानने  मेरा साथ देता था
वो उसके दोनो पल्लों को बाहों की तरह खोल देता था
ये अनबन तो जैसे मेरे जीवन में अनी जानी थी
मेरे कमरे की वो खिड़की बड़ी सयानी थी
जब होती शाम टोह ये खिड़की चेहक चेहक के गीत गाती थी
मेरे हर दोस्त की आवाज़ इसके पेहलू से ही आती थी
इसने कयी बार की मुझसे शिकायत भी
की क्यूं बिल्लू की खिड़की को तुम ऐसे सताते हो
क्‍यूं अपना बल्ला हमेशा उसी की ओर घुमाते हो
शायद उन दोनो खिड़कियों की अपनी इक कहानी थी
मेरे कमरे की वो खिड़की बड़ी सयानी थी
जवानी की दस्तक भी इसी खिड़की ने सुनाई मुझको
इसी के कंधे तले थी वो लड़की दिखाई मुझको
की जिसके नाम का चर्चा मैने ना जाने कितने साल अपने दिल से किया
उसकी दिनचर्या को कलमों की तरह याद किया
8 बजे सुबह वो स्कूल jaati थी
7:45 पे वो नहा के आती थी
वो कंगा हरजाई जाने कैसे ज़ुल्म करता था
की बाल बनाती वो थी…. जान मेरी निकल जाती थी
फिर खिड़की ने उनके हुस्न की तारीफ की इक तरकीब निकाली
उनके दीदार पे खुद ही खुल जाती थी साली
वो हसीन नहीं समझ पायी नीयत इस खिड़की की …और हाये जो करी कलाकारी
मेरे प्यार भरे पैगाम पर … ए अल्लाह उन्होने चप्पल उतारी
खैर निशाना कच्चा था उनका …
मैं तो बच गया खिड़की नहीं बच पायी हाये
उसने अपने 4 by 6 के दो काँच गवाये
मैने समझाया उसे की अच्छा नहीं जोश-ए-जवानी
मेरे कमरे की वो खिड़की थी बड़ी सयानी
सच्चे दोस्त नहीं होते हैं जुदा
उनकी दोस्ती की हिफाज़त तो खुद करता है खुदा
शायद इसी लिये उसने मुझे बुढापे मे इतना वक़्त दिया
बुझाये लाख मेरे अपनो के नहीं बूझा है मेरे जीवन का दिया
अब बस मैं हूँ और मेरी दोस्त ये खिड़की पुरानी है
इसके साथ ही गुफ्तगू मे बाकी उम्र जानी है
ये आज भी सुनाती मुझे अपने और परायों की कहानी है
सच में… ये मेरे कमरे की खिड़की बोहोत सयानी है

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